“क्या आपके साथ भी ऐसा होता है कि आप जानते हैं क्या सही है, पर उसे कर नहीं पाते? हाल ही में हमारे चैनल पर एक साथी ने बहुत गहरी बात पूछी—उन्होंने कहा कि आज की दुनिया डिस्ट्रैक्शन से भरी है, हवा तक शुद्ध नहीं है, हम सब कुछ जानते हुए भी अंत में हार क्यों जाते हैं? आज का वीडियो इसी ‘क्यों’ और उसके ‘कैसे’ (Solution) के बारे में है। स्वागत है आपका ‘अलौकिक दुनिया’ में।”
यह सवाल पढ़कर मैं कुछ देर के लिए रुक गई। एक साइकोलॉजिस्ट के तौर पर मैं जानती हूँ कि यह सिर्फ ‘आलस’ नहीं है। यह एक बहुत गहरा मानसिक द्वंद्व है। हम उस दौर में हैं जहाँ हमारा शरीर 2026 में है, पर हमारा मन हज़ारों साल पुरानी प्रोग्रामिंग और आज की डिजिटल दुनिया के बीच फँस गया है। आज के इस वीडियो में हम तुरंत किसी ‘नुस्खे’ पर नहीं जाएंगे, बल्कि पहले यह समझेंगे कि हमारे साथ ऐसा हो क्यों रहा है।”
“सबसे पहले समझिए कि आप ‘Unable to do’ वाली स्थिति में क्यों हैं। एक साइकोलॉजिस्ट के तौर पर मैं आपको बता दूँ कि यह आपकी इच्छाशक्ति (Willpower) की कमी नहीं है, बल्कि आपके Subconscious Mind की प्रोग्रामिंग है。
“सबसे पहले यह समझिए कि जब आप कहते हैं कि ‘मैं जानता हूँ पर कर नहीं पाता’, तो आपके अंदर क्या घट रहा होता है?
Cognitive Dissonance (वैचारिक मतभेद): हमारे दिमाग में दो हिस्से लड़ रहे हैं। एक हिस्सा (Conscious) कहता है कि ‘लक्ष्य पाना है’, दूसरा हिस्सा (Subconscious) कहता है कि ‘अभी रील देखने में ज़्यादा मज़ा है’。 जब इन दोनों में टकराव होता है, तो मानसिक थकान पैदा होती है, और अंत में हम हार मानकर वही करते हैं जो आसान है।
The Pollution of Thought जैसा कि कमेंट में कहा गया कि ‘हवा शुद्ध नहीं है’, इसका एक मनोवैज्ञानिक पहलू भी है। हमारे आसपास का ‘Psychological Environment’ इतना भारी हो गया है कि हर तरफ़ डर, ईर्ष्या और भागदौड़ है। जब हम ऐसे वातावरण में रहते हैं, तो हमारा अवचेतन मन उसे सोख लेता है। आप चाहकर भी एकाग्र नहीं हो पाते क्योंकि आपकी ‘मानसिक हवा’ प्रदूषित हो चुकी है。
आज हमारे पास जानकारी इतनी ज़्यादा है कि हमारा दिमाग जाम (Freeze) हो जाता है। हमें पता है कि 100 चीजें सही हैं, और यही ‘ज़्यादा जानना’ ही हमारे काम न करने की सबसे बड़ी वजह बन जाता है। हम सोचने में इतनी ऊर्जा लगा देते हैं कि कदम उठाने के लिए कुछ बचता ही नहीं。”
“अब बात करते हैं उस ‘अलौकिक’ जुड़ाव की। हमारी प्राचीन परंपराओं में इसे ‘चित्त की चंचलता’ कहा गया है।
साक्षी भाव (The Observer): मनोविज्ञान में हम इसे ‘Self-Awareness’ कहते हैं। जब आप यह कहते हैं कि ‘मुझसे नहीं हो पा रहा’, तो आप खुद को एक हारा हुआ इंसान मान लेते हैं। लेकिन अगर आप सिर्फ एक ‘देखने वाले’ बन जाएं कि ‘देखो, मेरा मन आज फिर भटक रहा है’, तो आप उस भटकाव से अलग हो जाते हैं।
ज्योतिष और विज्ञान दोनों मानते हैं कि हमारे मन पर बाहरी ऊर्जाओं का असर होता है। अगर आपकी आंतरिक ऊर्जा (Internal Energy) कम है, तो बाहरी डिस्ट्रैक्शन आप पर हावी हो जाएंगे。हमें समाधान से पहले अपनी ‘Energy’ को वापस समेटना होगा।”
“तो समाधान की शुरुआत कहाँ से करें? तुरंत सब कुछ बदलने की कोशिश न करें।
मौन का छोटा टुकड़ा: दिन भर में सिर्फ 5 मिनट ऐसे निकालें जहाँ आप कुछ न करें। न फोन, न विचार, न काम। बस बैठें। यह आपके दिमाग को ‘Reset’ करने का मौका देता है।
17 सेकंड का ठहराव: अब्राहम हिक्स कहते हैं कि 17 सेकंड तक किसी एक शुद्ध विचार पर टिकना ही काफी है。 पूरे दिन का बोझ मत उठाइए, बस अगले 17 सेकंड के लिए खुद को शांत रखिए।
रात की प्रोग्रामिंग: सोने से पहले जब आप ‘अल्फा स्टेट’ में होते हैं, तो खुद को यह मत कहिए कि ‘आज का दिन खराब गया’। बल्कि सिर्फ यह महसूस कीजिए कि ‘मैं शांत हूँ और मैं नियंत्रण में हूँ’。”
आप हार नहीं रहे हैं, आप बस एक बहुत शोर भरी दुनिया में खुद को ढूँढने की कोशिश कर रहे हैं। यह सफर लंबा है, पर नामुमकिन नहीं। कप्तान (चेतन मन) थक ज़रूर गया है, पर जहाज डूबा नहीं
अगर आप भी इस मानसिक बोझ को महसूस करते हैं, तो कमेंट में ‘Shanti’ लिखें। हम अपनी वेबसाइट और आने वाले video के ज़रिए ऐसे ही गहरे मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक हल लेकर आते रहेंगे。 जुड़े रहिए ‘अलौकिक दुनिया’ से। धन्यवाद।”

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