आज्ञा का अर्थ होता है आदेश। यह चक्र मस्तिष्क के पास दोनों भौंहों के बीच में स्थित होता है, इसलिए इसका आपके बौद्धिक ज्ञान से गहरा संबंध है। भौंहों के बीच में होने की वजह से इसे तीसरी आंख भी कहा जाता है। बैंगनी रंग का यह चक्र कल्पना शक्ति और पूर्वाभास की क्षमता बढ़ाता है। आपके अंदर की सारी शक्तियों को जागृत करके सारे अवगुणों को समाप्त करता है। यह चक्र चेतना के स्तर पर सिर्फ आत्मा और परमात्मा के अस्तित्व को ही स्वीकार करता है। इसके संतुलित रहने पर आप स्थिर और मानसिक रूप से शांति का अनुभव करते हैं।
इस चक्र के गुण हैं – एकता, शून्य, सत, चित्त और आनंद। ‘ज्ञान नेत्र’ भीतर खुलता है और हम आत्मा की वास्तविकता देखते हैं – इसलिए ‘तीसरा नेत्र’ का प्रयोग किया गया है जो भगवान शिव का द्योतक है। आज्ञा चक्र ‘आंतरिक गुरू’ की पीठ (स्थान) है। यह द्योतक है बुद्धि और ज्ञान का, जो सभी कार्यों में अनुभव किया जा सकता है। उच्चतर, नैतिक विवेक के तर्कयुक्त शक्ति के समक्ष अहंकार आधारित प्रतिभा समर्पण कर चुकी है। तथापि, इस चक्र में एक रुकावट का उल्टा प्रभाव है जो व्यक्ति की परिकल्पना और विवेक की शक्ति को कम करता है, जिसका परिणाम भ्रम होता है।
अगर आपकी ऊर्जा आज्ञा में सक्रिय है, या आप आज्ञा तक पहुंच गये हैं, तो इसका मतलब है कि बौद्धिक स्तर पर आपने सिद्धि पा ली है। बौद्धिक सिद्धि आपको शांति देती है। आपके अनुभव में यह भले ही वास्तविक न हो, लेकिन जो बौद्धिक सिद्धि आपको हासिल हुई है, वह आपमें एक स्थिरता और शांति लाती है। आपके आस पास चाहे कुछ भी हो रहा हो, या कैसी भी परिस्थितियां हों, उस से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
जब मनुष्य के अन्दर आज्ञा चक्र जागृत हो जाता है तब मनुष्य के अंदर अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से मनुष्य के अन्दर सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं और मनुष्य एक सिद्धपुरुष बन जाता है। अतः जब इस चक्र का हम ध्यान करते हैं तो हमारे शरीर में एक विशेष चुम्बकीय उर्जा का निर्माण होने लगता है उस उर्जा से हमारे अन्दर के दुर्गुण ख़त्म होकर, आपार एकाग्रता की प्राप्ति होने लगती है। विचारों में दृढ़ता और दृष्टि में चमक पैदा होने लगती है।
आज्ञाचक्र जिसे हम तीसरा नेत्र भी कहते है, इस चक्र के गुण हैं – एकता, शून्य, सत, चित्त और आनंद। ‘ज्ञान नेत्र’ भीतर खुलता है और हम आत्मा की वास्तविकता देखते हैं – इसलिए ‘तीसरा नेत्र’ का प्रयोग किया गया है जो भगवान शिव का द्योतक है। इसके जागृत होते ही देव शक्ति प्राप्त होती है। दिव्या दृष्टि की सिद्धि होती है। दूर दृष्टि प्राप्त होता है , त्रिकाल ज्ञान मिलता है। आत्मा ज्ञान मिलता है , देव दर्शन होता है। व्यक्ति अलोकिक हो जाता है।

Leave a Reply